जिन लोगों को दूर बैठकर हमेशा यह लगता है कि संघ के आयोजनों का प्रभाव और स्वरूप इतना वृहद कैसे हो जाता है, यह लेख उनके लिए है...

20 सितंबर 2026 को भोपाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एकत्रीकरण कार्यक्रम

-अभिलाष ठाकुर

दिनांक 20 सितंबर 2026 को भोपाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एकत्रीकरण कार्यक्रम संपन्न हुआ। वैसे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेकों कार्यक्रमों में निरंतर सहभागिता का सौभाग्य प्राप्त होता ही रहता है, और उन कार्यक्रमों में संबोधित करने वाले श्रेष्ठजनों से संघ दिशा पर मार्गदर्शन भी सदैव ही प्राप्त हुआ है। लेकिन उन कार्यक्रमों में अन्य व्यवस्थाओं में संलग्न रहने के कारण शायद कभी उतनी एकाग्रता के साथ सुनना संभव नहीं हुआ। 

किंतु कल प्रचार विभाग की व्यवस्था में रहने के चलते पूरे संबोधन को शब्दशः सुना। इतने ध्यानपूर्वक सुनने के बाद लगा कि जिन्हें सदैव ये विस्मय रहता है कि संघ का स्वरूप इतना बड़ा कैसे है और संघ की यात्रा शताब्दी वर्ष तक अपने स्वरूप में निरंतर विस्तार करते हुए कैसे बढ़ती रही, उनके लिए संघ विचार का मूल पहुंचाना आवश्यक है।

संघ ने शताब्दी वर्ष में 'पंच परिवर्तन' की बात कही है। इन पंच परिर्वतन में एक है 'स्व का बोध' होना। कल माननीय सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी के पूरे संबोधन का यदि सार कहा जाए तो केवल यही एक वाक्य होगा 'स्व का बोध'।

20 सितंबर 2026 को भोपाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एकत्रीकरण कार्यक्रम

उन्होंने कहा कि - "भारत का समाज हमेशा से बहुत सामर्थ्यवान रहा है, इसी सामर्थ्य के कारण अनेकों आक्रमण, चुनौतियों और परतंत्रता के लंबे कालखंड को सहने के बाद भी हमारा राष्ट्र आज आत्मगौरव के साथ विश्व में खड़ा है। हमारे समाज के पास सामर्थ्य की कभी कमी नहीं रही, लेकिन कभी-कभी यह भाव विस्मृत हुआ। जिसके चलते कुछ कालखंड के लिए अंधकार का वातावरण छाया। 

ऐसे अवसर कई बार आते रहते हैं, जब हम अपनी क्षमताओं को विस्मृत कर देते हैं। तब हमारे अंदर छुपे इस सामर्थ्य को स्मरण कराने की आवश्यकता जान पड़ती है। रामायण काल में भी पड़ी। तब जामवंत जी ने हनुमान जी को उनका सामर्थ्य याद दिलाया था। जिसके परिणाम हम सभी को ज्ञात हैं। जामवंत जी जैसे महापुरुष भी समय-समय पर आते रहते हैं। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्यसंघचालक पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी भी ऐसे ही महापुरुष थे, जिन्होंनें समाज के अंदर के इसी सामर्थ्य को पहचाना और एकजुटता की कमी का भान किया। तब आरएसएस के रूप में समाज की सुप्त चेतना को जगाने का काम प्रारंभ हुआ।

20 सितंबर 2026 को भोपाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एकत्रीकरण कार्यक्रम संपन्न हुआ

संघ ने कोई अविष्कार नहीं किया। संघ ने तो बस हिन्दू समाज की चेतना को जागृत करने का काम किया है। बाकी जो कुछ किया सब समाज ने ही किया। जिसके परिणामस्वरूप कभी विश्वगुरु होने वाला भारत, विस्मृति के कारण पीछे गया लेकिन आज पुनः आत्मविश्वास के साथ विश्व में अपनी गौरवपूर्ण स्थिति में आ रहा है।

इस पूरी प्रक्रिया में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने केवल प्रेरणा का काम किया, जिसके बाद समाज स्वयं चैतन्य हुआ, अपने मूल चरित्र को पहचान कर संगठित हुआ और संगठन की शक्ति से ही भारत का सकारात्मक उद्भव हुआ।" इसके अलावा भी अपने विस्तृत संबोधन में उन्होंने अन्य बातें भी कहीं, लेकिन मूल यही था।

संबोधन के यही शब्द संघ विस्तार का प्रमुख सूत्र हैं। जहाँ स्वार्थ नहीं सेवा को प्राथमिकता है। माननीय सरकार्यवाह जी चाहते तो कह सकते थे कि सब संघ ने किया। संघ की शक्ति के कारण भारत का उत्थान हो रहा है। वह कह सकते थे कि हमनें हिन्दू समाज का कल्याण किया, हम इसके पालक है या हम इसके नेतृत्वकर्ता हैं। लेकिन नहीं उन्होंने कहीं भी अपने पूरे संबोधन में एक बार चूक से भी, 'न शब्द - न भाव' से भी ऐसा व्यक्त नहीं किया। उन्होंने बीसों बार यह पुनरावृत्ति की होगी कि आज भारत में जो भी सकारात्मक बदलाव हो रहे हैं वह हमारे हिन्दू समाज की जागृति से ही हो रहे हैं। समाज के सामूहिक सामर्थ्य से ही भारत निखर रहा है। उन्होंने हर बार भारतीय समाज यानि कि हम सबको इसका श्रेय दिया। 

स्व की भावना का यह राष्ट्रीयकरण, अपने स्वार्थ को समाज के लिए समर्पित करने का यही भाव हर नागरिक को प्रभावित करता है। यही संघ की कार्यसंस्कृति है। जहाँ शिविर से लेकर सेवा तक हर कार्य में सामूहिकता को प्राथमिकता दी जाती है। और स्वयं उसके सूत्रधार होते हुए भी कभी श्रेय लेने की कोशिश नहीं की जाती। 

"नेकी कर दरिया में डाल" यदि यह वाक्य कहीं वास्तविक अर्थों में चरितार्थ होता है तो वह केवल संघ और इसके स्वयंसेवकों में ही होता है। इसलिए राष्ट्र की हर विपत्ति चाहे वह युद्ध का समय हो या आपदा का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक अग्रणी भूमिका में आकर अपना सामाजिक दायित्व निभाते हैं। और उस परिस्थिति के समाप्त होने के बाद कभी भी किसी मंच पर उसका श्रेय लेते या उसके लिए सम्मान व पुरस्कार के लिए लालायित नहीं होते। 

राष्ट्र के कार्य को अपना मानना और अपने हर व्यक्तिगत कार्य को राष्ट्र का कार्य मानना। जब कोई दूसरा है ही नहीं, सब हमारा है और हम सबके हैं, तो फिर कैसा स्वार्थ? यही संघभाव है। यही शताब्दी वर्ष की यात्रा का मंत्र है। 

स्वार्थी हिंदू को को सेवाभावी बनाना, असंगठित को संगठित करना, समाज को जागृत करना, स्व का बोध कराना, स्व-चरित्र में राष्ट्रीय चरित्र विकसित करना; शाखा से शिखर तक की यात्रा का यही उद्देश्य है। 

यही उद्देश्य लोगों को जोड़ता है, संघ के प्रति आकर्षित करता है और यही इस वृहद विस्तार का आधार है। इसलिए आगे कभी यदि संघ का कोई आयोजन हो, तो उसमें जन सहभागिता को देखकर बस विस्मृत मत होइए। कुछ समय निकालकर उस आयोजन में हो आइए। संघ का विचार समझने का प्रयास कीजिए। इसके बाद यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि आप तो संघ के आयोजन से निकल जाएंगे लेकिन संघ कभी आपके भीतर से कभी नहीं जाएगा। क्योंकि वह तो एक राष्ट्रीय चेतना है, जो एक बार जागी, तो आमरण राष्ट्रबोध कराती है।

वंदेमातरम्।

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