हनुमान अंश: भारत के आत्मतत्त्व का प्रकटीकरण


-डॉ राधा मिश्रा 

आजकल चर्चा इस बात की हो रही है कि ‘हनुमान अंश’ ने बॉक्स ऑफिस पर कितनी कमाई की, किस बड़ी फिल्म को पीछे छोड़ा और कितने करोड़ का व्यवसाय किया। सिनेमा की दुनिया में सफलता को मापने का यह सामान्य तरीका है। किंतु यदि ‘हनुमान अंश’ की चर्चा केवल उसकी कमाई तक सीमित कर दी जाए, तो हम इस घटना के सबसे महत्वपूर्ण पक्ष को समझने से वंचित रह जाएँगे।

असल प्रश्न यह नहीं है कि फिल्म ने कितना कमाया। प्रश्न यह है कि सीमित संसाधनों से बनी, आध्यात्मिक विषय पर केंद्रित और बिना किसी स्थापित महानायक के सहारे आगे बढ़ी यह फिल्म भारत के जनमानस में इतनी गहराई से कैसे उतर गई। यही कारण है कि इसे केवल एक फिल्म के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय समाज के भीतर चल रही एक गहरी सांस्कृतिक प्रक्रिया के रूप में देखने की आवश्यकता है।

यह सफलता शायद हमें बता रही है कि भारत को केवल बाजार समझने वाले लोग अभी भी भारत को पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं। भारत एक विशाल बाजार है, किंतु भारत केवल बाजार नहीं है। यहाँ का मनुष्य केवल वस्तुओं का उपभोक्ता नहीं है; उसके भीतर स्मृतियाँ हैं, प्रतीक हैं, आस्थाएँ हैं, कथाएँ हैं और जीवन के ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर वह केवल धन और सुविधा में नहीं खोजता।

यही कारण है कि आज का भारतीय युवा नवीनतम स्मार्टफोन का उपयोग करते हुए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में जीते हुए और वैश्विक संस्कृति से जुड़ते हुए भी अवसर मिलने पर गीता के प्रश्नों की ओर लौटता है, हनुमान चालीसा सुनता है और संतों की कथाओं में जीवन का अर्थ खोजता है। कुछ लोगों को यह विरोधाभास दिखाई दे सकता है, किंतु वास्तव में यही भारत है।

भारत आधुनिकता को स्वीकार करता है, पर अपनी आत्मा को त्यागने की शर्त पर नहीं। भारत तकनीक चाहता है, विकास चाहता है और आर्थिक समृद्धि भी चाहता है, किंतु उसके भीतर यह प्रश्न भी जीवित रहता है कि यदि सब कुछ प्राप्त हो जाए और मनुष्य के भीतर शांति न हो, तो उस उपलब्धि का अर्थ क्या है?

भारतीय सभ्यता ने हजारों वर्षों से मनुष्य और जीवन के इन्हीं प्रश्नों पर विचार किया है। क्या मनुष्य केवल शरीर है? क्या उसकी आवश्यकताएँ केवल आर्थिक हैं? क्या सुख केवल वस्तुओं से प्राप्त होता है? भारतीय जीवन-दृष्टि ने अर्थ को कभी अस्वीकार नहीं किया। अर्थ और काम दोनों को पुरुषार्थ माना गया, किंतु भारत यहीं नहीं रुकता। वह धर्म और मोक्ष की भी बात करता है। अर्थात् जीवन केवल प्राप्त करने की यात्रा नहीं, स्वयं को समझने की यात्रा भी है।

यहीं ‘हनुमान अंश’ जैसी फिल्म मनोरंजन से आगे बढ़ जाती है। यह उस भारतीय स्मृति को स्पर्श करती है जिसके भीतर संत केवल धार्मिक पात्र नहीं हैं। भारत में ऋषि, मुनि और संत समाज की चेतना के महत्वपूर्ण स्रोत रहे हैं। उन्होंने मनुष्य को केवल पूजा-पद्धति नहीं दी, बल्कि प्रेम, सेवा, भक्ति, ज्ञान और आत्मबोध की दिशा भी दी।

नीम करौली बाबा इसी व्यापक संत परंपरा के महत्वपूर्ण नाम हैं। उनकी हनुमान भक्ति, सेवा और प्रेम से जुड़ी शिक्षाओं ने भारत ही नहीं, विदेशों में भी अनेक लोगों को प्रभावित किया। ‘हनुमान अंश’ ने इसी जीवन-धारा को सिनेमा के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुँचाया।

आज कल्चरल मार्क्सवाद से प्रभावित कुछ सांस्कृतिक दृष्टियाँ धर्म, परंपरा, परिवार, मंदिर और पूजा को मुख्यतः सत्ता, नियंत्रण और दमन के चश्मे से देखने का प्रयास करती हैं। इसके परिणामस्वरूप नई पीढ़ी के सामने कई बार यह धारणा निर्मित होती है कि अपनी परंपरा से दूरी बनाना ही आधुनिकता है।

लेकिन व्यक्ति की स्वतंत्रता और आधुनिकता का अर्थ अपनी सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक जड़ों से मुक्त हो जाना नहीं है। भारतीय जीवन-दृष्टि व्यक्ति को केवल एक अकेली इकाई के रूप में नहीं देखती। यहाँ व्यक्ति परिवार, समाज और व्यापक सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा हुआ है। मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं रहे, बल्कि समाज और संस्कृति को जोड़ने वाले केंद्र भी रहे हैं। पर्व केवल उत्सव नहीं, पीढ़ियों को जोड़ने वाली स्मृतियाँ रहे हैं।

ऐसे समय में ‘हनुमान अंश’ का युवाओं के बीच पहुँचना अपने आप में एक सांस्कृतिक उत्तर है। जिस युवा पीढ़ी को अपनी परंपरा से दूर माना जा रहा था, उसी ने भारतीय संत और हनुमान भक्ति से जुड़ी कथा को स्वीकार किया। फिल्म ने किसी राजनीतिक नारे या वैचारिक अभियान के माध्यम से युवाओं को नहीं जोड़ा। उसने केवल भारत की अपनी कथा कही और युवा पीढ़ी ने उसे स्वीकार किया।

आज का युवा स्मार्टफोन भी रख सकता है और हनुमान चालीसा भी सुन सकता है। वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में जी सकता है और अपने संतों से प्रेरणा भी ले सकता है। वह वैश्विक संसार से जुड़ा हुआ हो सकता है और फिर भी अपनी भारतीय पहचान पर गर्व कर सकता है। आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना नहीं है।

नीम करौली बाबा की आध्यात्मिक परंपरा ने अनेक पश्चिमी लोगों को भी प्रभावित किया। अमेरिका के मनोवैज्ञानिक रिचर्ड एलपर्ट भारत आने के बाद नीम करौली बाबा से प्रभावित हुए और आगे चलकर राम दास के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनकी पुस्तक Be Here Now ने पश्चिमी समाज में भारतीय आध्यात्मिक चिंतन, योग और ध्यान के प्रति व्यापक जिज्ञासा उत्पन्न की।

स्टीव जॉब्स भी भारत की आध्यात्मिक परंपराओं को समझने की खोज में भारत आए थे, यद्यपि उनकी नीम करौली बाबा से प्रत्यक्ष भेंट नहीं हुई थी। मार्क जुकरबर्ग का कैंची धाम से जुड़ा प्रसंग भी व्यापक रूप से चर्चित रहा है।

इन उदाहरणों का अर्थ यह नहीं कि भारतीय अध्यात्म को महान सिद्ध करने के लिए हमें विदेशी स्वीकृति की आवश्यकता है। भारतीय अध्यात्म की शक्ति किसी विदेशी प्रमाणपत्र पर निर्भर नहीं है। किंतु यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि आधुनिक तकनीक, वैश्विक पूँजी और भौतिक सफलता के संसार से जुड़े लोग भी जीवन के किसी मोड़ पर भारत की आध्यात्मिक परंपराओं की ओर देखते हैं।

धन सुविधा दे सकता है, तकनीक शक्ति दे सकती है और विज्ञान जीवन को अधिक सुगम बना सकता है, किंतु ये अपने आप मनुष्य को यह उत्तर नहीं देते कि मैं क्यों जी रहा हूँ, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है और सफलता के बाद भी भीतर रिक्तता क्यों है?

ये मनुष्य के मूल प्रश्न हैं और भारत की विशिष्टता यह है कि उसने इन्हें जीवन के केंद्र में रखा। योग भीतर की यात्रा का विज्ञान है, ध्यान उसका अभ्यास है, वेदांत उसका दार्शनिक विस्तार है और भक्ति उस खोज का भावात्मक मार्ग है।

इसीलिए ‘हनुमान अंश’ की सफलता को केवल धार्मिक भावनाओं के उभार के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है। यह उस भारतीय मनुष्य की उपस्थिति का संकेत है जो आधुनिक है, किंतु अपनी जड़ों से कटना नहीं चाहता; जो विकास चाहता है, किंतु जीवन को केवल विकास-दर में नहीं मापता।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न हम भारतीयों के सामने है—क्या हमें अपनी परंपरा की महत्ता तभी समझ आती है जब कोई विदेशी उसकी प्रशंसा करे? क्या हमें योग, गीता और संत परंपरा की शक्ति तब दिखाई देती है जब पश्चिम उन्हें अपनाता है?

यदि ऐसा है तो यह हमारी विरासत की कमजोरी नहीं, हमारी आत्मविस्मृति की समस्या है।

हमें अपनी परंपराओं को आँख बंद करके स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है, किंतु उन्हें आँख बंद करके अस्वीकार करने का भी कोई कारण नहीं है। हमें अपने संतों का अध्ययन करना होगा, उनके दर्शन को समझना होगा और उनकी शिक्षाओं को आधुनिक संदर्भ में देखना होगा।

भारत को समझने6 के लिए केवल सत्ता, अर्थव्यवस्था और संघर्ष की भाषा पर्याप्त नहीं है। भारत को समझने के लिए उसकी आत्मा की भाषा भी समझनी होगी।

उस भाषा में हनुमान हैं, राम हैं, उपनिषद हैं, बुद्ध हैं, गुरु नानक हैं, विवेकानंद हैं और असंख्य संत हैं जिन्होंने भारत के सामान्य मनुष्य को बताया कि प्रेम भी जीवन है, सेवा भी जीवन है, त्याग भी जीवन है और स्वयं को जानने की यात्रा भी जीवन है।

इस दृष्टि से ‘हनुमान अंश’ केवल एक फिल्म नहीं है। यह भारत के भीतर अभी भी जीवित उस चेतना का प्रकटीकरण है जिसे कुछ वैचारिक धाराओं ने समाप्त मान लिया था।

इसकी कमाई कुछ वर्षों बाद केवल एक आँकड़ा रह जाएगी। रिकॉर्ड टूटेंगे और नई फिल्में आएँगी। किंतु यदि इस फिल्म ने किसी युवा को पहली बार यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित किया कि नीम करौली बाबा कौन थे, भारतीय संत परंपरा क्या है और भारत ने मनुष्य तथा जीवन के बारे में हजारों वर्षों से क्या सोचा है, तो इसकी सफलता बॉक्स ऑफिस से कहीं बड़ी होगी।

क्योंकि भारत के आध्यात्म की गहराई अथाह है। ‘हनुमान अंश’ केवल उसकी एक झलक है।

इसलिए ‘हनुमान अंश’ केवल एक फिल्म नहीं है—यह भारत के आत्मतत्त्व का प्रकटीकरण है। यह उस भारत की पुनर्स्मृति है जिसे हमें स्वयं पहचानना होगा। 

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