BRICS के नए दौर में भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका : चंद्रशेखर पटेल


-चंद्रशेखर पटेल

  • 2009 से 2026 तक की यात्रा,
  • 2014 के बाद सक्रिय कूटनीति तथा विस्तारित BRICS में भारत के सामने अवसर,
  • उपलब्धियाँ और नई जिम्मेदारियाँ

विश्व राजनीति आज ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ पुराने शक्ति-समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। इसी बदलती विश्व व्यवस्था के बीच BRICS का विस्तार और भारत की भूमिका विशेष महत्व रखती है। BRICS की शुरुआत 2009 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से यह BRICS बना। इसके बाद 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE और सऊदी अरब तथा 2025 में इंडोनेशिया के जुड़ने से इसका स्वरूप और व्यापक हुआ। इस प्रकार जिस समूह में भारत प्रारंभ से एक संस्थापक शक्ति था, वह आज अधिक विविध और प्रभावशाली वैश्विक मंच बन चुका है। इस यात्रा को 2014 के बाद भारत की विदेश नीति में आए बदलाव के संदर्भ में देखना उपयोगी होगा। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने विदेश नीति को केवल पारंपरिक कूटनीतिक संबंधों तक सीमित रखते हुए आर्थिक हितों, रणनीतिक साझेदारियों, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक, वैश्विक दक्षिण और प्रवासी भारतीयों से जोड़ा। Neighbourhood First, Act East और SAGAR जैसे दृष्टिकोणों के साथ भारत ने अपने पड़ोस, हिंद-प्रशांत, खाड़ी क्षेत्र, अफ्रीका और पश्चिमी देशों के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

मोदी सरकार के दौर में अनेक देशों के साथ संबंधों को उच्चस्तरीय राजनीतिक सक्रियता, आर्थिक साझेदारी और रणनीतिक सहयोग के नए आयाम मिले। अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंधों की गहराई, फ्रांस के साथ रक्षा एवं अंतरिक्ष सहयोग, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ हिंद-प्रशांत साझेदारी तथा रूस के साथ लंबे समय से चले रहे संबंधों को बनाए रखने का प्रयास भारत की बहुस्तरीय कूटनीति का हिस्सा है।खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंध भी इस अवधि में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हुए। ऊर्जा, निवेश, व्यापार, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और आतंकवाद के विरुद्ध सहयोग ने भारत और खाड़ी देशों के संबंधों को व्यापक बनाया। UAE और सऊदी अरब अब केवल ऊर्जा आपूर्ति के स्रोत नहीं, बल्कि निवेश और रणनीतिक साझेदारी के महत्वपूर्ण केंद्र भी हैं। इसलिए BRICS के विस्तार में इन देशों की भागीदारी भारत के लिए आर्थिक और कूटनीतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का एक महत्वपूर्ण प्रमाण 2023 में G20 की अध्यक्षता के दौरान दिखाई दिया, जब भारत ने अफ्रीकी संघ को G20 का स्थायी सदस्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे भारत ने यह संदेश दिया कि उसकी विदेश नीति केवल राष्ट्रीय हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि विकासशील देशों की आवाज को वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रभावी बनाने का भी प्रयास करती है। Global South के देशों के साथ भारत का संवाद इसी व्यापक सोच का हिस्सा है। BRICS के संदर्भ में 2014 भी एक महत्वपूर्ण वर्ष था। इसी वर्ष ब्राजील के फोर्टालेजा में New Development Bank की स्थापना का समझौता हुआ। इसकी अवधारणा और संस्थागत विकास सामूहिक BRICS प्रक्रिया का परिणाम था और आगे चलकर यह विकासशील देशों के लिए वैकल्पिक विकास-वित्त के महत्वपूर्ण संस्थानों में शामिल हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि BRICS केवल राजनीतिक संवाद का मंच नहीं, बल्कि आर्थिक और संस्थागत सहयोग का माध्यम भी बन सकता है।

आज विस्तारित BRICS भारत के लिए अनेक नए अवसर लेकर आया है। ऊर्जा-संपन्न पश्चिम एशिया, संसाधन और बाजार की दृष्टि से महत्वपूर्ण अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया की विनिर्माण क्षमता तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था इन सभी को एक मंच पर जोड़ने की संभावना भारत के लिए महत्वपूर्ण है। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, भुगतान प्रणालियों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों और आपूर्ति शृंखला जैसे क्षेत्रों में भारत अपने अनुभव को साझेदार देशों के साथ साझा कर सकता है। 2024–25 के विस्तार ने BRICS का भौगोलिक और आर्थिक दायरा बढ़ाया है, लेकिन इसके भीतर राजनीतिक हितों की विविधता भी बढ़ी है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद तथा व्यापार असंतुलन महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं। रूस और पश्चिम के बीच तनाव, पश्चिम एशिया में संघर्ष तथा ईरान और UAE जैसे सदस्य देशों के अलग-अलग रणनीतिक हित BRICS के भीतर सर्वसम्मति की राह को कठिन बनाते हैं।

यही कारण है कि 2026 में भारत की BRICS अध्यक्षता विशेष महत्व रखती है। नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन का आयोजन भारत की कूटनीतिक क्षमता की परीक्षा का अवसर है। पश्चिम एशिया के संकट के बीच साझा भाषा और साझा दृष्टिकोण विकसित करना महत्वपूर्ण होगा। भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता उसका संतुलन है। भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी रखता है, रूस से रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखता है, यूरोप के साथ आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग बढ़ाता है, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ हिंद-प्रशांत में साझेदारी करता है और BRICS तथा SCO जैसे मंचों पर चीन एवं अन्य देशों के साथ संवाद भी बनाए रखता है। यह किसी एक खेमे में शामिल होने की नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों के अनुरूप अनेक शक्ति-केंद्रों के साथ संबंध रखने की रणनीति है।BRICS में भारत की भूमिका तभी ऐतिहासिक महत्व प्राप्त करेगी, जब उसका कूटनीतिक प्रभाव आर्थिक और तकनीकी सामर्थ्य में भी दिखाई दे। 2009 में चार देशों से शुरू हुई BRICS की यात्रा 2026 में एक विस्तृत वैश्विक मंच तक पहुँच चुकी है। इस यात्रा में भारत केवल एक सदस्य नहीं, बल्कि संस्थापक देश से लेकर वर्तमान अध्यक्ष देश तक की भूमिका में रहा है। अब चुनौती इन संभावनाओं को दीर्घकालिक राष्ट्रीय शक्ति में बदलने की है।

 लेखक रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर के कार्यपरिषद सदस्य है

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