- चंद्रशेखर पटेल
भारत में यात्राओं की परंपरा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने की नहीं रही है। भारतीय जीवन-दृष्टि में यात्रा समाज से जुड़ने, अनुभवों को साझा करने और किसी व्यापक उद्देश्य के लिए आगे बढ़ने का माध्यम रही है। काशी से वडनगर तक चल रही ‘सेवा संकल्प बाइक यात्रा’ को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन में सेवा को साधना, सुशासन को संकल्प और राष्ट्र निर्माण को सर्वोपरि ध्येय बनाकर जन-जन के जीवन में परिवर्तन की नई चेतना जगाई है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के जन्मदिन और सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर शुरू हुए ‘सेवा संकल्प अभियान’ के अंतर्गत 17 सितंबर को वाराणसी से 250 बाइकों पर 500 युवाओं की यात्रा वडनगर के लिए रवाना हुई। यह यात्रा 10 राज्यों के 193 जिलों और 1,159 गांवों से होकर गुजर रही है। इसका महत्व केवल इन आंकड़ों में नहीं, बल्कि युवा शक्ति को सेवा, जनसंवाद और सामाजिक सरोकारों से जोड़ने के प्रयास में है। भारत की जनसंख्या संरचना में युवाओं की बड़ी हिस्सेदारी है। इसलिए राष्ट्र के भविष्य की चर्चा युवा शक्ति के बिना अधूरी है। प्रश्न यह है कि युवा अपनी ऊर्जा और सामर्थ्य को किस दिशा में लगाए। जब युवा गांवों और समाज के बीच पहुंचता है, तो वह केवल संदेश नहीं देता, बल्कि स्थानीय समस्याओं, लोगों की अपेक्षाओं और विकास की वास्तविक चुनौतियों को समझने का अवसर भी प्राप्त करता है। किसी भी जनअभियान की वास्तविक परीक्षा मंच पर नहीं, बल्कि जनता के बीच उसके संवाद और सहभागिता में होती है।
‘सेवा’ भारतीय समाज के लिए कोई नया विचार नहीं है। परिवार, समाज, धार्मिक संस्थाओं और स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से सेवा की लंबी परंपरा रही है। आधुनिक चुनौती यह है कि सेवा को अवसर विशेष की गतिविधि तक सीमित न रखकर नागरिक जीवन का संस्कार बनाया जाए। ‘सेवा संकल्प अभियान’ में जल, जन, सेवा और संकल्प को प्रमुख आधार बनाया गया है। पौधारोपण, स्वच्छता, स्वास्थ्य जांच और जनसंवाद जैसी गतिविधियां सेवा को समाज की वास्तविक आवश्यकताओं से जोड़ती हैं। काशी और वडनगर का चयन इस यात्रा को विशिष्ट सांस्कृतिक संदर्भ देता है। भारत में यात्राएं सदियों से सांस्कृतिक एकता का माध्यम रही हैं। एक क्षेत्र का व्यक्ति दूसरे क्षेत्र में जाकर वहां की भाषा, परंपरा और जीवनशैली को समझता था। आज तकनीक ने संवाद को क्षणभर का बना दिया है, फिर भी प्रत्यक्ष जनसंपर्क का महत्व कम नहीं हुआ है। समाज को समझने के लिए लोगों के बीच जाना और उनकी बात सुनना आज भी आवश्यक है।
इस यात्रा में जल को महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में जोड़ा गया है। योजना के अनुसार उत्तर प्रदेश की पवित्र नदियों का जल वडनगर में भगवान हाटकेश्वर महादेव को और गुजरात की नदियों का जल काशी में बाबा विश्वनाथ को समर्पित किया जाएगा। जल भारतीय सभ्यता में केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं रहा, नदियों के किनारे नगर, कृषि और संस्कृतियां विकसित हुईं। आज जलस्रोतों के संरक्षण, भूजल, वर्षाजल संचयन और नदियों की स्वच्छता की चुनौतियों के बीच जल को यात्रा से जोड़ना पर्यावरणीय और सामाजिक जिम्मेदारी का स्मरण भी कराता है।किसी भी बड़े अभियान का महत्वपूर्ण पक्ष जनसंवाद है। जनसंवाद केवल अपनी बात कहना नहीं, बल्कि सामने वाले को सुनना भी है। विभिन्न राज्यों और गांवों से गुजरते हुए युवाओं को भारत की सामाजिक विविधता और जीवन की वास्तविकताओं को करीब से समझने का अवसर मिलेगा। राष्ट्रबोध केवल पुस्तकों से नहीं बनता.वह समाज और देश की विविध परिस्थितियों को समझने से भी विकसित होता है।
यह अभियान भारतीय जनता पार्टी द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की श्रृंखला का हिस्सा है, इसलिए इसका राजनीतिक संदर्भ स्वाभाविक है। लेकिन इसके सामाजिक पक्ष को भी समझना आवश्यक है। लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं है। नागरिक सहभागिता, सामाजिक उत्तरदायित्व और सामुदायिक भागीदारी भी लोकतांत्रिक जीवन के महत्वपूर्ण आधार हैं। युवा यदि स्वच्छता, जल संरक्षण, पर्यावरण, स्वास्थ्य या शिक्षा जैसे कार्यों में नियमित योगदान देता है, तो वह भी राष्ट्रनिर्माण में अपनी भूमिका निभा रहा है।
यात्रा समाप्त होगी, संकल्प नहीं
काशी से वडनगर की यात्रा एक दिन समाप्त हो जाएगी, लेकिन उसका वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब इससे जुड़े युवा अपने-अपने क्षेत्रों में सेवा के कार्यों को आगे बढ़ाएं। एक युवा एक पेड़ की जिम्मेदारी ले, कोई समूह रक्तदान को नियमित गतिविधि बनाए, कोई जल संरक्षण का संकल्प ले और कोई शिक्षा या स्वास्थ्य के क्षेत्र में समय दे ऐसे छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़े सामाजिक परिवर्तन का आधार बन सकते हैं। राष्ट्र का निर्माण केवल नीतियों और योजनाओं से नहीं होता। राष्ट्र तब मजबूत होता है, जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझते हैं। जब युवा यह समझ लेता है कि सेवा किसी अभियान का विषय नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार है, तभी काशी से वडनगर तक की यह यात्रा अपने वास्तविक गंतव्य तक पहुंचती है।
लेखक रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर के कार्यपरिषद सदस्य है