त्योहार, विज्ञापन और कल्चरल मार्क्सवाद द्वारा 'फ्री पब्लिसिटी' और ज्ञान बांटने का कॉर्पोरेट खेल

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डॉ राधा मिश्रा

हर वर्ष भारत में हिंदू त्योहार आते ही टीवी और सोशल मीडिया पर विज्ञापनों की बाढ़ आ जाती है। लेकिन बीते कुछ सालों से एक बेहद चालाक और खतरनाक ट्रेंड देखने को मिल रहा है। त्योहारों से जुड़े विज्ञापनों में सांस्कृतिक मानदंडों और परंपराओं को उपेक्षा करना, धार्मिक रीति-रिवाजों पर बिना मांगे ज्ञान बांटना, और फिर उस पर होने वाले विवाद के जरिए अपने ब्रांड की 'फ्री पब्लिसिटी' (Free PR) भुनाना।

जब आप ऐसे विज्ञापनों और उन पर होने वाले विवादों का निष्पक्ष विश्लेषण करते हैं, तो चाहे किसी को पसंद आए या न आए, समाज का गुस्सा बिल्कुल सही और वास्तविक दृष्टि से भी सही समझ आता है।

'कंट्रोवर्सी मार्केटिंग' और मुफ्त पब्लिसिटी का खेल

आज के समय में विज्ञापन केवल उत्पाद (Product) बेचने का जरिया नहीं रहे, बल्कि वे एक सोची-समझी व्यावसायिक रणनीति बन चुके हैं। जिसे कॉर्पोरेट दुनिया में 'निगेटिव पब्लिसिटी' या 'कंट्रोवर्सी मार्केटिंग' कहा जाता है, ब्रांड्स उसी का सहारा ले रहे हैं।

विज्ञापनदाताओं को भली-भाँति पता है कि किसी पावन त्योहार के अवसर पर अगर परंपराओं के खिलाफ या असंगत चीजें दिखाई जाएंगी, तो सोशल मीडिया पर हो-हल्ला होगा। लोग रिएक्ट करेंगे, बहस छिड़ेगी, और देखते ही देखते बिना एक भी अतिरिक्त रुपया खर्च किए ब्रांड का नाम करोड़ों लोगों की वाणी पर चढ़ जाएगा। यानी ट्रोल्स और विवाद के बल पर ब्रांड्स को बिना मेहनत करोड़ों रुपये का मुफ्त प्रचार मिल जाता है।

जैसे तनिष्क का दिवाली विज्ञापन त्योहारों पर 'ज्ञान' की राजनीति

इस विवादित ट्रेंड का सबसे बड़ा उदाहरण 2020 में आया तनिष्क आभूषण ब्रांड का दिवाली विज्ञापन था। दिवाली के शुभ अवसर पर गहने बेचने आई कंपनी ने अपने विज्ञापन के जरिए समाज को 'सीख' देना शुरू कर दिया था।

प्रश्न यह उठता है कि क्या किसी ज्वेलरी ब्रांड को यह अधिकार है कि वह सदियों पुराने धार्मिक त्योहारों को मनाने का तरीका तय करे? दिवाली प्रकाश, आतिशबाजी और उल्लास का पर्व है, लेकिन विज्ञापनों में बार-बार त्योहारों को ही प्रदूषण या समाज की किसी न किसी समस्या का जिम्मेदार बनाकर प्रस्तुत कर दिया जाता है। तनिष्क ने जिस तरह दिवाली को 'सुधारने' का पाठ पढ़ाया, और उसके पीछे सास - बहु वाला दिमागी षड्यंत्र रचकर लव जिहाद को बढ़ावा दिया। ऐसे विज्ञापन समाज की आस्था और परंपराओं पर सीधा आक्षेप करते है। बाद में तनिष्क को क्षमा माँगनी पड़ी और विज्ञापन वापस भी लेना पड़ा, वैसे ही गिवा (Giva) आभूषण ब्रांड का रक्षाबंधन विज्ञापन की मर्यादा को चुनौती देता है।

जीस तरह गिवा (Giva) के रक्षाबंधन विज्ञापन में अभिनेत्री कृति सेनन को अत्यंत कम कपड़ों में बैठकर अपने भाई को राखी बांधते हुए दिखाया गया। भारत के हिंदू परिवारों में रक्षाबंधन जैसे पावन और पारिवारिक पर्व पर ऐसे पहनावों को पूरी तरह से अनुचित माना जाता है। किसी भी आम घर में अगर कोई महिला ऐसे कपड़े पहनकर पूजा में बैठेगी, तो उसे विनम्रता से कपड़े बदलने के लिए कहा जाएगा। भले ही कोई सिद्धांत रूप में इससे असहमत हो, लेकिन यही भारत की धरातलीय वास्तविकता है।

इसी प्रकार, कृति सेनन के  रक्षाबंधन विज्ञापन में पालतू कुत्ते को भी राखी बाँधते हुए दिखाया गया। रक्षाबंधन जैसे पारिवारिक और धार्मिक पर्व के संदर्भ में इस प्रकार के चित्रण ने भी त्योहार की पारंपरिक भावना और मर्यादा को लेकर प्रश्न खड़े किए।

कल्चरल मार्क्सवाद का एजेंडा

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे केवल व्यावसायिक लालच ही नहीं, बल्कि 'कल्चरल मार्क्सवाद' का एक गहरा वैचारिक एजेंडा भी काम कर रहा है।

कल्चरल मार्क्सवाद का मूल उद्देश्य ही समाज की स्थापित धार्मिक परंपराओं, पारिवारिक मर्यादाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों को 'पिछड़ा' या 'अनुचित' ठहराकर ध्वस्त करना है। इसके अंतर्गत त्योहारों की पवित्रता और पारिवारिक मर्यादा को 'कट्टरता' या स्वतंत्रता पर प्रतिबंध' बताकर प्रस्तुत किया जाता है।

पुरानी और नई पीढ़ी के बीच अपनी ही सांस्कृतिक जड़ों को लेकर हीनभावना पैदा करने का प्रयास किया जाता है।

जब जनता इसका विरोध करती है, तो 'फ्रीडम ऑफ चॉइस' (Freedom of Choice) और 'प्रगतिशीलता' की ढाल ओढ़ ली जाती है। और इसे परंपरा बनाम पहनावा बना दिया जाता है।

भारत में हर त्योहार और अवसर का अपना एक सांस्कृतिक शिष्टाचार (Etiquette) होता है। पारिवारिक या धार्मिक पर्वों पर मर्यादित कपड़े पहनना किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आक्रमण नहीं, बल्कि उस अवसर और परिवार के प्रति सम्मान का प्रतीक है।

यह नियम केवल महिलाओं पर लागू नहीं होता, बल्कि पुरुषों पर भी उतना ही लागू होता है जैसे रक्षाबंधन या दिवाली की पूजा में अगर घर का कोई लड़का शॉर्ट्स और स्लीवलेस टी-शर्ट पहनकर बैठ जाए, तो उसे भी तुरंत टोका जाएगा।

त्योहार के शुभ अवसर पर यदि कोई लड़का काला या बिल्कुल सफेद कुर्ता पहनकर आ जाए, तो उसे भी कपड़े बदलने की राय देंगे।

लेकिन कल्चरल मार्क्सवाद से प्रभावित मीडिया और विज्ञापन एजेंसियां इस सामान्य पारिवारिक शिष्टाचार को 'महिला-विरोधी' या 'रूढ़िवादिता' का रूप देकर प्रस्तुत करती हैं, जो पूरी तरह से असत्य और भ्रामक नैरेटिव है।

सेलेब्रिटीज का दोहरा मापदंड

सबसे रोचक बात यह है कि इन विज्ञापनों में काम करने वाले कलाकार खुद अच्छी तरह जानते हैं कि किस अवसर पर क्या पहनना चाहिए। उदाहरण के लिए, जब वही कृति सेनन अपने घर पर गणेश पूजा करती हैं या दगडू सेठ गणपति मंदिर के दर्शन करने जाती हैं, तो पूरी तरह पारंपरिक और मर्यादित पोशाक में नजर आती हैं। वहां वे विज्ञापन वाले कपड़े नहीं पहनतीं।

यानी सेलेब्रिटीज को खुद पता है कि धर्म और परंपरा का सम्मान क्या होता है। लेकिन कैमरों के सामने आते ही, भारी-भरकम फीस और विज्ञापन कंपनियों के एजेंडे के लिए वे ऐसे कपड़े और सीन शूट करती हैं जहां उत्पाद से ज्यादा ध्यान उनके शरीर और विवादित लुक पर होता है।

हर व्यक्ति को अपनी पसंद के कपड़े पहनने और अपनी जीवन जीने का पूरा अधिकार है। लेकिन अपनी 'स्वतंत्रता' का उल्लेख कर करोड़ों रुपये कमाने के चक्कर में किसी समाज की संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों की मर्यादा का उपहास उड़ाने का अधिकार किसी ब्रांड या कलाकार को नहीं है।

तनिष्क का दिवाली पर ज्ञान देना हो या गिवा का रक्षाबंधन पर मर्यादा तोड़ना, त्योहारों को नीचा दिखाकर 'फ्री पब्लिसिटी' बटोरना न तो आधुनिकता है और न ही उचित व्यापार। अब भारत का जागरूक समाज इस चालाकी को समझ चुका है और अपनी पहचान की उपेक्षा सहन करने के मूड में पूर्णतः नहीं है।

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