ये दुखी होने का नहीं, सबक लेने का समय है
हमें अपने बच्चों को बचाना है तो भारत की परंपरा ही एकमात्र रास्ता है
प्रियंका कौशल
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में 19 वर्षीय कुणाल चांदगुडे ने आईफोन खरीदने की ज़िद में ऐसा कदम उठाया कि एक झटके में मां, बाप और बेटे तीनों की ज़िंदगियां समाप्त हो गईं।
कुणाल चांदगुडे ने आईफोन के लिए अपने पिता मुरलीधर से लड़ाई कर ली। पिता की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वे फोन दिलाने में असमर्थ थे। पिता की मजबूरी को समझने के बजाए नाराज होकर बेटा सुबह खदान के किनारे पहाड़ी पर जाकर कूदने की धमकी देने लगा। लगभग तीन घंटे तक पुलिस,फायर ब्रिगेड और गांव वालों के साथ मिलकर माता-पिता उसे समझाते रहे। उससे मिन्नतें करते रहे, लेकिन बेटे के सर पर सवार जूनून ने जैसे उसकी सोचने-समझने की क्षमता ही खत्म कर दी थी। दोपहर लगभग एक बजे जब पिता मुरलीधर उसे पकड़कर बचाने के लिए आगे बढ़े, तो बेटे ने छलांग लगा दी।
पिता का संतुलन बिगड़ने से वे भी नीचे गिर गए। पति और बेटे को नीचे गिरते देख स्तब्ध और दुखी मां संगीता ने भी पहाड़ी से छलांग लगा दी, जिससे तीनों की मौके पर ही मौत हो गई।
यह एक दूसरे को समझे बिना गुस्सा दिखाने और आपसी संवाद, विश्वास और प्रेम की कमी के कारण पूरे परिवार के खत्म हो जाने का बेहद दर्दनाक उदाहरण है। अब इस घटना का जिस-जिस को पता चल रहा है, वह बहुत दुखी हो रहा है। लेकिन ये केवल दुखी होने का नहीं बल्कि सबक लेने का अलार्म है।
हम अपने बच्चों को बड़ा करते समय कुछ भारतीय परम्परागत सिद्धांतो को भूल रहे हैं, इसकी परिणीति छत्रपति सम्भाजी नगर की घटना के रूप में सामने आती है। प्रश्न यह है कि हमें क्या करना होगा कि ऐसी दुःखद घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
बालकों को आध्यात्मिक बनाएं।
बच्चे छोटे हैं, इन्हें क्या सिखाएं! यह सोच खत्म कीजिये। छोटे बच्चों को भी भजन, ध्यान, अध्यात्म, ईश्वर से जोड़ें। इसके लिए स्वयं भी सुधार करें। अपनी और परिवार की दैनंदिनी में पूजा, अर्चना, प्रार्थना, मंत्रोच्चार और प्रभु से जुड़ना, सप्ताह में कम से कम एक बार मंदिर जाना शामिल करें। इससे अन्तर्मन मजबूत होता है। नकारात्मकता हावी नहीं होती। जटिल परिस्थितियों में मन स्थिर होना सीखता है।
अपने बच्चों से बात करें।
अपने बच्चों से बातें करना अपनी आदत बनाएं। उनके दोस्त कौन हैं? आज उन्होंने क्या किया? स्कूल/कॉलेज में दिन कैसा बीता? उनके टीचर कैसे हैं? बच्चों की प्रतिक्रिया बहुत महत्वपूर्ण होती है। उन्हें सुनें और सही बात का विश्लेषण कर उन्हें अपने सुझाव भी दें। उन्हें अपने संघर्ष के बारे में बताएं। उनमें बचपन से उनकी छोटी-छोटी जिम्मेदारी समझाएं।
बच्चों को खेलकूद या उनकी रुचिकर गतिविधियों से जोड़ें
मोबाइल इस समय पूरी पीढ़ी को बर्बाद कर रहा है। उससे दूरी बनाने के लिए बच्चों को पढ़ाई के अतिरिक्त खेलकूद या अन्य रुचिकर गतिविधियों से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करें। जो बच्चे खेल, चित्रकारी, अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेते हैं, उनका गुस्सा कण्ट्रोल रहता है। उनमें रचनात्मकता का विस्तार होता रहता है।
बच्चों को स्काउट गाइड, एनसीसी या एनएसएस से जोड़ें
जो बच्चे बचपन से किसी अनुशासनात्मक संगठन से जुड़ते हैं। उनका व्यक्तित्व निखर जाता है। वे आत्म संयम रखना सीखते हैं। उनमें घर,परिवार, समाज और राष्ट्र को देखने की विशेष दृष्टि विकसित होती है। बच्चों में देशप्रेम का भाव भरिए।
बचपन से महापुरुषों की कहानियां सुनना शुरू करें
हमारी पीढ़ी में हम दादी-नानी, माता-पिता से कहानियां सुनकर बड़े हुए। कहानियों के माध्यम से हमारे बड़े हममें संस्कार, जीवन मूल्य, साहस, शौर्य, भक्ति, शक्ति, धैर्य, सहनशीलता, विनम्रता, देशप्रेम के गुण स्वतः ही भर देते थे। समय आने पर यह छोटी-छोटी कहानियां हमारे लिए पथ प्रदर्शक का काम करती थीं। अब इस नई पीढ़ी के माता-पिता को भारत की महान परम्परा को पुनः व्यवहार में लाना होगा।
मोबाइल से नहीं अपनी दादी नानी से सीखिए पैरेंटिंग
आज पैरेंटिंग पर बहुत बातें होती हैं। बड़ी बड़ी वर्कशॉप होती हैं। बच्चे कैसे पाले जाएं, इसपर किताबें लिखी जा रही हैं। मोबाइल पर लेक्चर देने वाले भी बहुतायत में हैं। उन बातों को सुनने के बजाए अपनी दादी नानी के नुस्खे अपनाइए। उनसे अच्छी पैरेंटिंग कोई नहीं सीखा सकता।
संयुक्त परिवार की तरफ लौटें
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम यदि अपनी संततियों को बचाना चाहते हैं तो हमें अपनी जड़ों की तरफ लौटना होगा। हमें संयुक्त परिवार की तरफ लौटना होगा। इससे सहनशक्ति का गुण आता है। समायोजन की शक्ति बढ़ती है। बच्चों की देखभाल करने के लिए कई लोग होते हैं। बच्चे आज्ञाकारी बनते हैं। प्रेम, सम्वाद, सहयोग, सुरक्षा का घेरा मजबूत होता है।
