प्रो. मनीषा शर्मा
लेखिका और शिक्षाविद
आज के डिजिटल क्रांति के युग में मोबाइल फोन बच्चों की दिनचर्या का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई, मनोरंजन और लोगो से संपर्क के लिए इसका प्रचलन इस कदर बढ़ गया है कि इसके बिना जीने की कल्पना मात्र से युवा सिहर जाते है।इसकी उपयोगिता से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन आज युवाओं के मध्य महंगे और ब्रांडेड फोन, खासकर आई फोन को लेकर बढ़ती दीवानगी माता पिता के लिए चिंता का सबब बन रही है। कई बच्चे फोन को अपनी जरूरत से ज्यादा स्टेटस सिंबल मानने लगे हैं।
इसी एडिक्शन का शिकार हुआ महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजी नगर (औसा)का कुणाल जिसने आईफोन की जिद में अपनी जिंदगी को ही दांव पर लगा दिया ।ना सिर्फ अपने बल्कि अपने मां-बाप की जिंदगी को भी अपनी जिद की भेंट चढ़ा दिया।कुणाल जो 19 वर्ष का था अपनी आईफोन खरीदने की जिद के कारण पहाड़ी से कूद कर जान देने की कोशिश करने लगा उसको बचाने में पिता गिर गए और इस सदमे में उसकी मां भी पहाड़ी से कूद गई। खबरों से पता पड़ा कि उसने आईफोन खरीद लिया था पर ईएमआई भरना उसके बस की बात नहीं थी। उसने परिवार से जिद की, परिवार वालों ने समझाया कि उनकी हैसियत इतनी नहीं है कि वह ईएमआई भर पाए ।बस वह अपनी जिद पूरी करने और घरवालों पर मानसिक दबाव बनाने के लिए पहाड़ी पर चला गया और कहने लगा कि नहीं भरोगे तो नीचे कूद जाऊंगा। इसी घटनाक्रम में एक ही परिवार के तीन लोगों की दर्दनाक मृत्यु हो जाती है।
बच्चों में आई फोन की इस बढ़ती चाहत के पीछे सोशल मीडिया, दोस्तों के समूह का प्रभाव और विज्ञापनों की बड़ी भूमिका है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य प्लेटफॉर्म पर महंगे फोन को सफलता , सम्पन्नता और आधुनिक जीवनशैली से जोड़कर दिखाया जाता है। जब एक बच्चा अपने दोस्तों के हाथ में नया आई फोन देखता हैं तो उसके मन में भी वैसा ही फोन पाने की ललक पैदा होती है। कई बार यह इच्छा इतनी तीव्र होती है कि वह इसके लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाता हैं।वह चोरी ,डकैती या कोई भी अपराध करने को भी तैयार हो जाता है।इस प्रकार जिद और सामाजिक दबाव में वह अपना विवेक खोकर किसी भी कीमत पर अपनी इच्छा की पूर्ति करना चाहता है।
इस प्रवृत्ति का असर केवल परिवार के बजट पर नहीं, बल्कि बच्चों की सोच पर भी पड़ता है। यदि बच्चा अपनी पहचान को सिर्फ महंगे फोन और ब्रांडेड वस्तुओं से जोड़ने लगे, तो उसमें दिखावे और तुलना की प्रवृत्ति बढ़ती है। ये हम सभी जानते है कि मोबाइल फोन के अत्यधिक इस्तेमाल से पढ़ाई, नींद , एकाग्रता प्रभावित होती है।
इसका समाधान बच्चों को पूरी तरह तकनीक से दूर करना नहीं है।क्योंकि ऐसा कर पाना मुश्किल है।स्मार्टफोन आज शिक्षा, संपर्क और जानकारी का महत्वपूर्ण साधन है। जरूरत है कि माता-पिता, शिक्षक बच्चों को तकनीक और उपभोक्तावाद के बीच अंतर समझाएं। फोन खरीदते समय उसकी कीमत या ब्रांड के बजाय उसकी उपयोगिता, जरूरत और परिवार की आर्थिक क्षमता को देखे।इसका सीमित और जरूरत पूर्ति के लिए प्रयोग हो।
युवा डिजिटल दुनिया और दिखावे में इसलिए फँस रहे हैं क्योंकि आज सोशल मीडिया ने तुलना, लोकप्रियता और उपभोग को जीवनशैली का हिस्सा बना दिया है । सोशल मीडिया पर लोग अपनी जिंदगी का चमकदार पक्ष दिखाते हैं। इससे युवाओं में तुलना की प्रवृत्ति बढ़ती है । ये देखकर वे अपनी जिंदगी को कमतर समझने लगते हैं। वर्तमान समय में युवा लाइक और फॉलोअर्स की संख्या को ही सब कुछ समझ ने लगे है। यह डिजिटल लोकप्रियता युवाओं के आत्मसम्मान से जुड़ने लग रही है। ज्यादा लाइक और फॉलोअर्स को ही आज सफलता का पैमाना माना जा रहा है। यह दिखावे की संस्कृति इस कदर युवाओं पर हावी हो गई है कि महंगे फोन, कपड़े, गाड़ियाँ, घूमने की जगहें और पार्टियाँ सोशल मीडिया पर नाम और प्रतिष्ठा के प्रतीक बन गए हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आते विज्ञापन लगातार ऐसी चीजें सामने लाते हैं जो युवाओं में खरीदने और बेहतर दिखने की इच्छा पैदा करती हैं। सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि और सफलता बहुत आसान दिखाई देती है। इससे मेहनत, धैर्य और वास्तविक उपलब्धियों का महत्व कम होने लगता है। इस डिजिटल दुनिया में हजारों की संख्या में फ्रेंड होने के बावजूद आज कई युवा अपनी जिन्दगी में अकेलेपन से जूझ रहे हैं।कई बार वास्तविक जीवन में संवाद की कमी को युवा डिजिटल दुनिया में समय बिताकर पूरा करने की कोशिश करते हैं।
आज असली चुनौती इस डिजिटल दुनिया के प्रभाव को समझना है जो एक नशे की तरह उन्हें अपनी गिरफ्त में लेती जा रही है। युवाओं को यह समझना होगा कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली जिंदगी पूरी तरह से सच नहीं होती। जीवन की वास्तविक सफलता महंगे फोन, ब्रांडेड सामान, लाइक या फॉलोअर्स में नहीं, बल्कि परिश्रम, ज्ञान, चरित्र , परिवार और आत्म विश्वास में है।
वर्तमान में माता पिता बच्चे की हर जरूरत पूरी करने को ही अपनी पेरेंटिंग समझ रहे है। कही न कही परिवार में संवाद कम हुआ है। हर घर में मोबाइल संस्कृति इस कदर हावी है कि चार लोग एक कमरे में बैठ कर भी अपने- अपने मोबाइल में बिजी दिखते है।माता-पिता को बच्चों के साथ खुलकर बातचीत करनी चाहिए और उन्हें समझाना चाहिए कि किसी महंगे फोन, गैजेट्स का होना सफलता या श्रेष्ठता का पैमाना नहीं है। बच्चों को खेल, किताबों, रचनात्मक गतिविधियों और वास्तविक सामाजिक संबंधों के लिए भी पर्याप्त समय देना जरूरी है।
स्मार्टफोन अपने आप में समस्या नहीं है; समस्या तब पैदा होती है जब वस्तु जरूरत से बढ़कर मान सम्मान,प्रतिष्ठा और पहचान का प्रतीक बन जाती है। बच्चों को तकनीक का समझदारी और संयम से इस्तेमाल करना सिखाना ही इस बढ़ती सनक का सबसे बेहतर समाधान है। बच्चे का व्यक्तित्व और संस्कार ही उसकी असली पहचान है। संवाद, समझाइश,समय और संयम के साथ परिवार के संस्कार उसे इस प्रकार के एडिक्शन और आभासी दुनिया से दूर रखने में सहायक हो सकते है।