अवतरण दिवस विशेष – 14 जून
डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
नहीं चाही प्रसिद्धि, नहीं यश का कोई मान लिया,
राष्ट्रधर्म की राह चलकर जीवन का वरदान दिया।
वनवासी, वंचित, पीड़ित जन के बीच दीप बन जलते रहे,
अपने सुख को त्याग सदा जनहित के पथ पर चलते रहे।
कर्मयोग की ऐसी गाथा इतिहासों में दुर्लभ मिलती है,
जहाँ तपस्या सेवा बनकर जन-जन के मन में खिलती है।
ऐसे युगपुरुष भाऊराव को शत-शत नमन हमारा है,
जिनके जीवन से आलोकित भारत का हर कोना सारा है।
भारतीय संस्कृति और राष्ट्रजीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि यहाँ ऐसे महापुरुष समय-समय पर जन्म लेते रहे हैं जिन्होंने अपने जीवन को किसी व्यक्तिगत उपलब्धि के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने स्वयं को नहीं, बल्कि अपने विचारों और कार्यों को महत्व दिया। ऐसे ही युगपुरुषों की श्रेणी में भाऊराव भुस्कुटे का नाम अत्यंत सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है।
14 जून को उनका अवतरण दिवस हमें उस महान कर्मयोगी के जीवन को स्मरण करने का अवसर देता है जिसने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र, समाज और विशेष रूप से वनवासी समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि वास्तविक महानता पद, प्रतिष्ठा और प्रचार में नहीं, बल्कि समाज के लिए किए गए निस्वार्थ कार्यों में निहित होती है।
भाऊराव भुस्कुटे उन व्यक्तित्वों में थे जिन्होंने अपने जीवन को राष्ट्रकार्य की साधना बना लिया था। वे केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि ऐसे चिंतक, संगठनकर्ता और कर्मयोगी थे जिन्होंने भारत के वनवासी क्षेत्रों और समाज के उपेक्षित वर्गों में आशा और आत्मविश्वास का संचार किया। उनका संपूर्ण जीवन भारतीय संस्कृति के उन आदर्शों का जीवंत उदाहरण है जिनमें सेवा को साधना, समाज को परिवार और राष्ट्र को परम आराध्य माना गया है।
वे मानते थे कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके अंतिम व्यक्ति के जीवन में निहित होती है। जब तक समाज का अंतिम व्यक्ति सम्मान और अवसर प्राप्त नहीं करता, तब तक विकास अधूरा रहता है। यही कारण था कि उन्होंने अपना अधिकांश समय उन क्षेत्रों में लगाया जहाँ विकास की किरणें अपेक्षाकृत कम पहुँची थीं।
भाऊराव भुस्कुटे का सबसे महत्वपूर्ण योगदान वनवासी समाज के बीच उनका कार्य रहा। उन्होंने वनवासी क्षेत्रों की समस्याओं को केवल दूर से नहीं देखा, बल्कि उनके बीच रहकर उन्हें समझा। उन्होंने अनुभव किया कि वनवासी समाज आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, किंतु उसके भीतर अद्भुत सांस्कृतिक शक्ति, जीवन मूल्यों और आत्मसम्मान का भंडार भी है।
उन्होंने वनवासी समाज को कभी दया का पात्र नहीं माना। उनके लिए वनवासी समाज भारतीय संस्कृति का जीवंत स्वरूप था। वे कहा करते थे कि भारत की सांस्कृतिक चेतना का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक रूप वनांचलों में आज भी सुरक्षित है। इसलिए वनवासी समाज का विकास केवल एक सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है।
उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक जागरण के अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से वनवासी समाज को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया। उनका विश्वास था कि विकास का वास्तविक अर्थ लोगों को सक्षम बनाना है, न कि उन्हें केवल सहायता प्रदान करना। वे चाहते थे कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा हो और आत्मविश्वास के साथ राष्ट्र निर्माण में भागीदारी करे।
भाऊराव जी के चिंतन का एक महत्वपूर्ण आधार था—“ग्रामोदय से राष्ट्रोदय।” उनका मानना था कि भारत का भविष्य गांवों में बसता है। यदि गांव समृद्ध होंगे, आत्मनिर्भर होंगे और वहां शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार की पर्याप्त व्यवस्था होगी, तो राष्ट्र स्वतः सशक्त बन जाएगा। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक संगठन, स्वावलंबन और जनभागीदारी की भावना को विकसित करने का कार्य किया। उनका मानना था कि किसी भी परिवर्तन का वास्तविक आधार समाज की सक्रिय भागीदारी होती है।
भाऊराव भुस्कुटे की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उनकी संगठन क्षमता थी। वे जानते थे कि अकेला व्यक्ति सीमित कार्य कर सकता है, लेकिन संगठित समाज बड़े से बड़ा परिवर्तन ला सकता है। इसलिए उन्होंने अपना अधिकांश समय कार्यकर्ताओं के निर्माण में लगाया। वे कार्यकर्ताओं को केवल निर्देश नहीं देते थे, बल्कि उन्हें प्रेरित करते थे, उनका मार्गदर्शन करते थे और उनके भीतर राष्ट्रभाव जागृत करते थे।
उनकी कार्यशैली अत्यंत सरल थी। वे स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करते थे और अपने आचरण से प्रेरणा देते थे। उनके लिए संगठन का अर्थ केवल संख्या नहीं, बल्कि संस्कारित, अनुशासित और समर्पित कार्यकर्ताओं का निर्माण था। यही कारण है कि उनके संपर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था।
यदि भाऊराव भुस्कुटे के जीवन को एक शब्द में व्यक्त करना हो तो वह शब्द है—“कर्मयोग।” उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के संदेश को अपने जीवन में उतारा। उन्होंने कर्म को पूजा माना और समाज सेवा को साधना। उन्होंने कभी अपने कार्यों का प्रचार नहीं किया और न ही सम्मान अथवा पुरस्कार की अपेक्षा रखी। उनके लिए राष्ट्र और समाज का कल्याण ही सबसे बड़ा पुरस्कार था।
आज जब समाज में प्रसिद्धि प्राप्त करने की होड़ दिखाई देती है, तब भाऊराव जी का जीवन हमें सिखाता है कि वास्तविक नेतृत्व वह है जो स्वयं पीछे रहकर दूसरों को आगे बढ़ाए। वे नेतृत्व के निर्माता थे, नेतृत्व के प्रदर्शनकर्ता नहीं।
उनके व्यक्तित्व में अद्भुत सादगी थी। वे साधारण जीवन जीते थे, लेकिन उनके विचार अत्यंत ऊँचे थे। उनमें संवेदनशीलता थी। समाज के किसी भी वर्ग की पीड़ा उन्हें व्यथित कर देती थी और वे उसके समाधान के लिए सक्रिय हो जाते थे। उनमें संगठन कौशल था। वे विभिन्न विचारों और पृष्ठभूमियों के लोगों को एक सूत्र में जोड़ने की क्षमता रखते थे। उनमें दूरदर्शिता थी। वे वर्तमान की चुनौतियों के साथ-साथ भविष्य की आवश्यकताओं को भी समझते थे। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उनमें अहंकार का पूर्ण अभाव था।
आज का युवा अनेक अवसरों और चुनौतियों के बीच खड़ा है। तकनीकी प्रगति ने नई संभावनाएँ दी हैं, लेकिन साथ ही जीवन में मूल्य संकट भी उत्पन्न किया है। ऐसे समय में भाऊराव भुस्कुटे का जीवन युवाओं के लिए दिशा देने वाला है। नई पीढ़ी उनके जीवन से सीख सकती है कि सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती, बल्कि समाज के लिए किए गए योगदान से भी मापी जाती है।
वे सिखाते हैं कि जीवन में उद्देश्य होना चाहिए। बिना उद्देश्य का जीवन दिशा विहीन हो जाता है। वे बताते हैं कि समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का भाव व्यक्ति को महान बनाता है। वे प्रेरणा देते हैं कि चुनौतियों से घबराने के बजाय उनके समाधान का हिस्सा बनना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे यह संदेश देते हैं कि सेवा ही मानव जीवन का सर्वोच्च धर्म है।
आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है, तब सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, ग्राम विकास, जनजातीय उत्थान और आत्मनिर्भरता जैसे विषय राष्ट्रीय प्राथमिकता बन चुके हैं। ये सभी विषय भाऊराव भुस्कुटे के जीवन और चिंतन के केंद्र में रहे हैं। उनका जीवन हमें बताता है कि किसी भी राष्ट्र का विकास तभी संभव है जब समाज का प्रत्येक वर्ग विकास की मुख्यधारा में सहभागी बने।
भाऊराव भुस्कुटे का जीवन भारतीय परंपरा के उस आदर्श का प्रतीक है जिसमें व्यक्ति स्वयं को राष्ट्र के लिए समर्पित कर देता है। उन्होंने न तो किसी पद की कामना की और न ही किसी व्यक्तिगत लाभ की। उनका संपूर्ण जीवन समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण, संगठन के विस्तार और राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित रहा।
उनका अवतरण दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और राष्ट्रभक्ति के उन मूल्यों को पुनः स्मरण करने का अवसर है जिनके बल पर भारत ने अपनी सांस्कृतिक चेतना को हजारों वर्षों तक जीवित रखा है। आज उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम अपने जीवन में सेवा, संगठन, समरसता, स्वावलंबन और राष्ट्रनिष्ठा के उन आदर्शों को स्थान दें जिनके लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
ऐसे महान कर्मयोगी, राष्ट्रऋषि, समाजशिल्पी और वनवासी उत्थान के अग्रदूत भाऊराव भुस्कुटे को उनके अवतरण दिवस पर विनम्र श्रद्धा, कृतज्ञ स्मरण और कोटिशः नमन। ॥
