यह वो तारीख है जब दुनिया में हजार सालों तक 2 सभ्यताओं पर डाला गया पर्दा हटा था.....दुनिया के अरबों लोगों की आंखों पर पड़े जाले हटे थे।
एक जिसे सपेरों, लुटेरों, अनपढ़, अंधविश्वासियों की दुनिया कहा गया.....दूजी जिसे हजार सालों तक अमन, चैन, इंसानियत का मसीहा बताया गया।
इस रोज 9/11 - 1893 में वह पर्दा हटा और दुनिया उस सपेरों की सभ्यता के आगे नतमस्तक हो गयी...उसके ज्ञान, बुद्धि, विवेक, संयम, अनुशीलन की याचक हो गई।
पहला 11 सितम्बर 1893 को जब एक भगवाधारी सन्यासी ने अपने शब्दों से अपने ज्ञान से , अपने आचरण से , अपने व्यवहार से , अपने शील से दुनिया का हृदय जीत लिया था।
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दूसरा 11 सितम्बर 2001 जब एक कथित अनपढ़, बेरोजगार, शोषित, पीढ़ित इंसान ने (ओसामा बिन लादेन ) अमेरिका की विराट बिल्डिंग पर हवाई हमले से 3000 से ज्यादा लोगों की जान ले ली.....और हजार सालों तक जिस सभ्यता को अमन, चैन, भाईचारा, इंसानियत की जो झूठी लीपापोती की गई थी, जो पर्दा डाला गया था वह उतरा था।
एक विशेष सम्प्रदाय की वैश्विक छवि एक दुर्दांत आतंकी समुदाय की बन गई, नतीजतन आज दुनिया के हर देश में उन्हें देखते ही लोगों के हाव - भाव, भंगिमाएं बदल जाती हैं। कई देशों के हवाई अड्डों पर उस समुदाय के प्रभावशाली लोगों तक कि नग्न तलाशी ली जाती है।
यह दिन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन पर दुनिया की 2 सभ्यताओं की वास्तविक छाप है।इस तारीख पर उनके आचरण की मुहर लगी है.... बस इतना ही अंतर है इन दो विचारधाराओं में....... एक कहता है "दया ही धर्म का मूल है".......अतैव
"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामय:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , मा कश्चित दुखभाग भवेत।।"
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दूसरा कहत है दया ही दुःख का कारण है........अतैव कोई रहम नहीं....कोई क्षमा नहीं......आर या पार "respect us or ready to war with us."
यह शरण देने वाले को ही एक रोज शरणार्थी बना देती है।
सो यह महज एक तारीख नहीं है, यह तारीख विश्व इतिहास में एक डिवाइडर है....एक बैरियर है। आग और पानी का अंतर बताने वाली तारीख है।
दूजा महत्वपूर्ण घटना क्रम आज ही के दिन 11 सितंबर 1967 को भारत चीन सीमा पर नाथुला में घटा था। जब रोज रोज की झड़पों से बचने भारतीय सेना ने वहां स्थायी बाढ़ लगाने का कार्य शुरू किया।
लेकिन डेढ़ हाथ के चीनी बौने 62 की गलतफहमी में खुद को शेर समझ बैठे थे..... और इस बार उनकी गलती ने वहीं उनकी जमीन पर कब्रिस्तान बनवा दिए। 11 सितंबर 1967 की सुबह जब भारतीय सैनिक बागड़ लगाने का काम कर रहे थे तभी सुबह 7.45 के करीब चीनियों ने अचानक अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी, नतीजतन बहुत भारी संख्या में भारतीय जबान बलिदान हो गए।
पुनः हुए इस धोखे से भारतीय सैनिकों की दशा घायल शेरों सी हो गई, लेकिन इस बार चीन की सारी हेकड़ी वहीं ऑन द स्पॉट निकाल दी गई। वहां भी ठीक वैसा ही घटनाक्रम घटा था जैसा गत वर्ष गलवान में हुआ। बागड़ का काम देख रहे कर्नल रायसिंह जी को 3 गोलियां लगीं और वह गिर पड़े, उनके साथ ही कई अन्य जवान भी घायल हुए।
इतनी भीषड़ फायरिंग थी कि भारतीय जवानों का बचना मुश्किल हो चला था..... जनरल सगतसिंह राठौड़ ने काफी संयम बरता, इंतेज़ार किया, की ऊपर से कुछ कड़ी कार्यवाही के आदेश मिले, लेकिन हमेशा की तरह दिल्ली ने हाथ बांध रखे थे, उस समय आर्टिलरी फायर का आदेश प्रधानमंत्री देते थे।
मजबूरन जनरल राठौड़ ने स्वयं अपने जवानों को आर्टिलरी फायर ओपन करने के आदेश दिए.... बस फिर अगले 3 दिन चीनियों ने महांकाल का तांडव देखा। भारतीय सैनिकों के बदले 4 गुना तक चीनी सैनिक मारे गए.....
भारतीय सैनिकों का प्रत्युत्तर इतना भयानक था कि आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं... की 62 में चीन ने 1 महीने में लगभग 750 सैनिक खोए थे, वहीं नाथुला में मात्र 3 दिन में भारतीयों ने उसके 400 से ज्यादा सैनिक ढेर कर दिए गर यह युद्ध उतना लंबा चलता तो चीनी को अपने हजारों सैनिक खोने पड़ते।
इतने विकराल तांडव ने चीनियों को बहुत गहरे तक भयाक्रांत कर दिया। इस प्रतिक्रिया ने चीनियों को भागने पर मजबूर कर दिया और अंततोगत्वा चीनियों को रहम की भीख मांगनी पड़ी। चीनियों का 62 वाला भ्रम हमने इसी दिन मिटा दिया था। इस हिसाब से यह कलंक मुक्ति दिवस भी है।
हालांकि हमारे कलम घसीटे इतिहासकारों ने इस विजय पर लंबे समय तक पर्दा डाले रखा।
लेकिन सिनेमाई हिरण्यकश्यपों के घर में रहने वाले प्रह्लाद जेपी दत्ता ने इस घटनाक्रम पर फ़िल्म "पलटन" बनाकर इस विजय की गाथा पुनः हम भारतीयों को सुनाई।
#World_changing_date
अतः आज का दिन बहुत स्मरणीय है..... यह हमारी पुनः विश्व विजय का दिवस है।
आप सभी को शुभकामनाएं..
🙏🙏🙏🙏🙏
Deepak Vishwakarma