बैतूल,हरदा,नर्मदापुर, रायसेन, विदर्भ, बुंदेलखंड, छत्तीसगढ़ के गाँव -गाँव में #बैल पूजन, #गेड़ी पूजन,#देव पूजन के साथ
#पोला त्यौहार मनाया गया।
#वनराज
आज के दिन सुबह से ही बैतूल, हरदा व विदर्भ क्षेत्र के सभी सनातन हिन्दू धर्म को मानने वाले ग्रामीण जन बड़े उत्साह से #पलाश की डालियां काटकर अपने घर लेकर आते हैं और अपने द्वार पर गेड़ी के रुप में स्थापित करते हैं। पूजन करते हैं, #पलाश के बक्कलों से बेल पत्तियाँ बांधकर उन्हें घर की सभी दैनंदिन उपयोग में आने वाली वस्तुओं में बांधते हैं।
ऐसी मान्यता है कि बरसात में अनेक बीमारियों के रोगाणु -जीवाणु व अन्य कीटाणुओं का प्रादुर्भाव घरों में हो जाता है वह पलाश के पेड़ की गंध से या उसके सम्पर्क में आने से मर जाते हैं ऐसी शक्ति पलाश के पेड़ की डालियों व बक्कलों में होती है।
दूसरे दिन इन बक्कलों को छोड़कर, व डालियों उठाकर गाँव के बाहर यह कहते हुए -
#रोग - राई ले जा रे पलशा
#खटमल -मच्छर ले जा रे पलशा
ढेकुन पीसा घेऊन जा नारबोद - खटमल, किल्ली लेकर जा नारबोद। बोलकर फेंक आते हैं, यानि घर की #बीमारी खत्म।
कुछ - कुछ गाँव में #पोला के दिन सभी लोग मिट्टी लाते हैं और मिट्टी के #बैल बनाते हैं जिनकी पूजा की जाती है।
सायंकाल सभी लोग अपनी बैल जोड़ियों
(जो सजी हुई रहती हैं उनकी पीठ पर जो झूमर डालते हैं उस पर भगवान शंकर, भगवान कृष्ण के व अन्य देवी- देवताओं के चित्र होते हैं) को लेकर गाँव के न केवल गोंड या कोरकू जनजाति के लोग बल्कि सभी जाति वर्ग के लोग अपने बैलों को बाहर वहाँ ले जाते हैं जहाँ तोरण बंधा होता है।
सभी उसके नीचे बैलों को एक पंक्ति में खड़ा करते हैं और पूजा करने वाला मंत्र बोलता है। फिर बंदूक की आवाज से तोरण तोड़कर #पोला फोड़ते हैं, और बैलों को दौड़ाते, नाचते - गाते घर लौटते हैं। बैलों का दौड़ाना एक प्रकार से बैलों का परीक्षण है कि वह आगे होने वाले कृषि कार्य में कमजोर तो नहीं पडेंगे।
घर में बैलों को खिचड़ी खिलाकर उनकी पूजा करते हैं।
घर में #महुआ के रस से खुरमा व बतियाँ बनाई जाती हैं जिनसे मिट्टी व लकड़ी के बने हुए बैलों की पीठ पर एक कपड़े से बनी हुई खुरजी में भर कर रखते हैं जो घर में धनधान्य का प्रतीक होती है। कुछ जनजाति परिवारों में महुआ के लड्डू भी बनाये जाते हैं जो बहुत ही पौष्टिक होते हैं।
#बुंदेलखंड क्षेत्र में इन लकड़ी के बने हुए बैलों को #घुल्ला कहा जाता है जिनसे दूसरे दिन छोटे -छोटे बच्चे दिन भर खेलते रहते हैं भूख लगने पर इन घुल्लों की पीठ पर लदे हुए खुरमा - बतियाँ खाते हैं। कुछ गाँवों में बच्चे घुल्ला दौड़ प्रतियोगिता भी करते हैं।
दूसरे दिन #पड़वा को जो जड़ी- बूटी के जानकार होते हैं वह सभी जंगल जाते हैं और #नारबोद, #भिलवा आदि वनस्पतियों की डालियां लाकर अपने घरों में खोंसते हैं जिससे कोई भी बीमारी के रोगाणु -कीटाणु घर में न आ सकें, ये सभी वनस्पतियां #कीटाणुनाशक होती हैं। सभी ग्रामवासी नारबोद एक - दूसरे को भेंट कर गले मिलते हैं।
कुछ अलगाववादी #लेखकों ने इस सामाजिक समरसता के पारम्परिक पोला पर्व को भी केवल #गोंड_जनजाति का बताकर गोंड समाज को सनातन #हिन्दू_समाज से अलग करने का प्रयास किया है, जबकि वास्तविक रुप से यह कृषिक्षेत्र से जुड़े हुए सभी जाति वर्ग के किसान वर्ग का लोक पर्व है।
गोंड जनजाति के युवक हमारी इस सनातन लोक पर्व को समझे और अलगाववादियों से दूर रहें।
सभी भाई - बहिनों को पोला पर्व की मंगलमय शुभकामनाओं के साथ बहुत -बहुत बधाई।
बृषभराज की जय।
सनातन धर्म संस्कृति की जय।